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स्वार्थ का समाज PDF Print E-mail
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Monday, 15 April 2013 09:16

अनुराग शर्मा
जनसत्ता 15 अप्रैल, 2013: अमेरिका के एक हवाई अड्डे से बाहर आकर जब पार्किंग तक जाने के लिए शटल बस में बैठा तो मेरे साथ कई अन्य लोग भी चढ़े।

बूढ़े हों या जवान, सीट लेने से पहले सबने अपनी भारी-भारी अटैचियों को सामान के लिए बनी जगह में करीने से लगाया। चालक भी सबके बैठने तक रुका रहा। अगले टर्मिनल पर फिर वही सब दोहराया गया। इस बार एक व्यक्ति के पास दो भारी सूटकेस सहित चार अदद थे। सामान की जगह खाली थी, लेकिन उसकी नजर सीट पर थी। वह सबसे आगे विकलांगों और बुजुर्गों के लिए छोड़ी सीट पर जम गया। चलने के लिए बनी थोड़ी-सी जगह में अपनी अटैचियां और थैले भी अपने आसपास जमा लिए। उसके बाद हर टर्मिनल पर लोग उसके सामान से अपने घुटने टकराते हुए निकलते रहे, मगर वह तसल्ली से अपने ‘आइफोन’ पर संगीत सुनता रहा।
मुझे याद आया डीटीसी की बस में एक कंडक्टर ने किसी को अपनी अटैची पीछे रखने को कहा था और इस बात पर लंबी बहस चली, जिसका निष्कर्ष यह निकाला कि सामान साथ न रखने पर उसके चोरी होने की आशंका बनी रहती है। मतलब यह कि जो आदमी दूसरों के लिए जितनी अधिक असुविधा पैदा कर सकता है, उसका माल उतना ही सुरक्षित है! समाज जितना अधिक स्वार्थी होगा, अपनी सुरक्षा और दूसरों की असुविधा का संबंध उतना ही गहरा होता जाएगा।
आज के भारत का हाल नहीं पता, लेकिन हमारे जमाने में एक व्यापक जनधारणा यह थी कि निजी क्षेत्र की क्षमता सरकारी तंत्र से अधिक होती है। दिल्ली में निजी क्षेत्र की रेड या ब्लू लाइन के अत्याचार रोज सहने वाले भी बिजली, पानी की बात चलने पर छूटते ही कहते थे- ‘प्राइवेट कर दो, दो दिन में हालत बदल जाएगी।’ सुना है अब सब निजी हो गया है और झुग्गी-झोंपड़ी वाले भी हजारों रुपए के बिल से त्रस्त हैं। सुनवाई के नाम पर बस एक ही कार्रवाई होती है- कनेक्शन काटने की। कुकुरमुत्ते की तरह उग आए निजी स्कूलों में बच्चों के


लिए शौचालय तक नहीं हैं और जनसेवा के नाम पर करोड़ों की जमीन खैरात में पाने वाले पांचसितारा अस्पतालों में मुर्दों को भी निचोड़ लेने की अफवाहें आती रहती हैं।
बदइंतजामी और भ्रष्टाचार के चलते जब एक निजी बैंक का दिवाला पिट गया तो उसके कर्मचारियों की नौकरी और जमाकर्ताओं की पूंजी बचाने के लिए उसका शव एक सक्षम सरकारी बैंक की पीठ पर लाद दिया गया। हमारी शाखाओं का भाषाई संतुलन रातोंरात बदल गया। पाटना वापस पटना हो गया, लेकिन बेचारे पद्मनाभन जी कुछ और बन गए। काम न जानने का आधार काम न करने का कारण बना और ‘सेवा के लिए विकास’ की जगह ‘मैन्नू ते कुछ पता इ नर्इं’ बैंक का नया आदर्श वाक्य बनने के सपने देखने लगा। कुल मिला कर काम करने वालों से काम तो होता है, लेकिन कभी-कभार गलती भी हो सकती है। लेकिन जिसने कभी कुछ किया ही नहीं, टोटल-मुफ्तखोरी की, उसकी कलम न कभी कोई कागज छूएगी, न कभी उनके हस्ताक्षर पकड़ में आएंगे। हारने दो उन्हें जो अपनी जिंदगी गुजार देते हैं खून-पसीना बहाने में।
समाज में सब कुछ सही नहीं है। लेकिन इतना तय है कि बेहतरी की जिम्मेदारी भी हमारी ही है। जब तक गलत करने वालों को सजा और सही उदाहरण रखने वालों को उत्साह नहीं मिलेगा, ‘ज्योतिर्गमय’ की आशा बेमतलब है। बुराई के साथ कोई रियायत नहीं, लेकिन यह सदा याद रहे कि भले लोगों से मतांतर होने पर भी सदुद्देश्य के मार्ग में हमें उनका हमसफर बने रहना है। सच कहूं तो मतांतर वाले सज्जनों की सहयात्रा हमारी उन्नति के लिए एक अनिवार्य शर्त है, क्योंकि वे हमें सत्य का वह पक्ष दिखाते हैं जिसे देखने की हमें आदत नहीं होती। अच्छाई को रियायत दीजिए। मिल-बैठ कर चिंतन कीजिए। एक दूसरे के सहयोगी बनिए। आंख मूंद कर चलना मूर्खों की पहचान है। आपके आसपास ‘क्या’ हो रहा है, के साथ ‘क्यों’ हो रहा है, पर भी पैनी नजर रखिए।

 

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