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द्रविड़ प्राणायाम PDF Print E-mail
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Monday, 01 April 2013 11:39

जनसत्ता 1 अप्रैल, 2013: श्रीलंकाई तमिलों की चिंता में एक दूसरे से आगे दिखने की तमिलनाडु की पार्टियों के बीच मची होड़ अब सारी मर्यादाएं पार कर गई है। कुछ दिन पहले मुख्यमंत्री जयललिता के असहयोग के कारण आइपीएल की संचालन परिषद को चेन्नई में आयोजित होने वाले क्रिकेट मैचों से श्रीलंका के खिलाड़ियों, अधिकारियों और अंपायरों को बाहर रखने का निर्णय करना पड़ा। लेकिन अब जयललिता ने विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित करा कर सीधे विदेश नीति को प्रभावित करने की मंशा जताई है। इस प्रस्ताव में कहा गया है कि भारत श्रीलंका को मित्र देश मानना बंद करे। यही नहीं, इसमें श्रीलंका पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने और तमिल ईलम यानी श्रीलंका के तमिलों के लिए अलग देश बनाने के लिए जनमत संग्रह कराने की भी मांग की गई है, जिनमें श्रीलंकाई मूल के वे तमिल भी शामिल किए जाएं जो दूसरे देशों में रह रहे हैं। जाहिर है, यह प्रस्ताव केंद्र सरकार के गले नहीं उतर सकता। लिहाजा, विदेशमंत्री सलमान खुर्शीद ने एक टीवी चैनल से बातचीत के दौरान इस प्रस्ताव को दो टूक खारिज कर दिया। जयललिता को भी अंदाजा रहा होगा कि केंद्र की ऐसी ही प्रतिक्रिया होगी। फिर विधानसभा में ऐसा प्रस्ताव क्यों लाया गया?
दरअसल, आम चुनाव में अब सिर्फ साल भर का समय रह गया है और तमिलनाडु की पार्टियों को लगता है कि श्रीलंका के तमिलों का मसला इतना भावनात्मक बन चुका है कि इसके सहारे वोट बटोरे जा सकते हैं। इसी अहसास के चलते कुछ दिन पहले द्रमुक ने यूपीए सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। 2-जी घोटाले में ए राजा और कनिमोड़ी पर लगे आरोपों ने द्रमुक की साख की हवा निकाल दी, और फिर विधानसभा चुनावों में उसे मुंह की खानी पड़ी। श्रीलंकाई तमिलों के मामले को तूल देने के पीछे अपनी खोई हुई सियासी जमीन फिर से पाने की


करुणानिधि की कोशिश ही रही होगी। इस मामले में उन्हें बढ़त बनाते देख जयललिता क्यों पीछे रहतीं! पर विधानसभा में पारित प्रस्ताव उनकी सरकार और वहां के राजनीतिक दलों के निहायत गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार को प्रदर्शित करता है। यह सही है कि किसी भी देश की विदेश नीति उसकी घरेलू परिस्थितियों से अलग-थलग नहीं हो सकती। पर कोई राज्य सरकार या किसी एक राज्य के राजनीतिक दल यह तय नहीं कर सकते कि अमुक देश के साथ भारत का रिश्ता कैसा हो। इस बारे में कोई नीति पूरे देश के दीर्घकालीन हितों को ध्यान में रख कर ही तय की जा सकती है।
श्रीलंकाई तमिलों पर हुए अत्याचार का विरोध और उनके लिए समान नागरिक अधिकारों की वकालत बिल्कुल वाजिब है, पर इसका यह मतलब नहीं कि द्रविड़ पार्टियां यह उम्मीद करें कि भारत श्रीलंका से संबंध तोड़ ले और उस पर पाबंदियां थोपे। सच तो यह है कि श्रीलंका से दोस्ताना रिश्ते रखते हुए ही उसे वहां के तमिलों के पक्ष में कुछ सार्थक कदम उठाने के लिए राजी किया जा सकता है। राजपक्षे सरकार ने गृहयुद्ध से सबक लेने और वहां की तमिल आबादी की मांगों पर विचार करने के लिए पिछले साल एक आयोग गठित किया था। पर भारत की उम्मीद के विपरीत उसने आयोग की सिफारिशें लागू नहीं की हैं। पर इसके लिए भारत अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ मिल कर दबाव बना सकता है। जयललिता यह भी चाहती हैं कि भारत नवंबर में कोलंबो में होने वाले राष्ट्रमंडल सम्मेलन का बहिष्कार करे। राष्ट्रमंडल के भीतर खुद श्रीलंका की मेजबानी और उसे इस संगठन के अगले कार्यकाल की अध्यक्षता सौंपे जाने को लेकर संशय है। पर ऐसी बेतुकी मांगें करने के बजाय यह अपेक्षा की जानी चाहिए कि राष्ट्रमंडल के दबाव में श्रीलंका कुछ जवाबदेही भरे कदम उठाने को तैयार हो।

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