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अंधविश्वास का घेरा PDF Print E-mail
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Saturday, 30 March 2013 11:26

जनसत्ता 30 मार्च, 2013: राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले में गंगापुर सिटी की घटना हैरान करने वाली है। इक्कीसवीं सदी में, जब दुनिया भर के वैज्ञानिक ब्रह्मांड के रहस्यों को जानने की कोशिश कर रहे हैं, कोई व्यक्ति कैसे इस कदर अंधविश्वासी हो सकता है कि ईश्वर से मिलने के भ्रम में वह पूरे परिवार सहित जान देने का फैसला कर ले। पेशे से फोटोग्राफर कंचन सिंह ने अपने परिवार के आठ लोगों के साथ पहले तंत्र-मंत्र के सहारे भगवान के प्रकट होने का इंतजार किया, फिर इस विश्वास के साथ जहर मिला लड्डू खा लिया कि उनके आराध्य उन्हें बचाने जरूर आएंगे। लड्डू खाने वालों में से पांच की तत्काल मृत्यु हो गई और बाकी मौत से लड़ रहे हैं। अंधश्रद्धा का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि मरने से पहले सबने बाकायदा निजी कैमरे के सामने सहज भाव से कहा कि वे भगवान से मिलने की इच्छा में जान दे रहे हैं। मरने वालों में कंचन सिंह का इंजीनियर भाई भी था। विज्ञान की पढ़ाई-लिखाई भी उसके दिमाग से अंधविश्वासों के जाले साफ नहीं कर सकी! घटना से संबंधित जानकारियों से जाहिर है कि आस्थावादी व्यक्ति की अंधश्रद्धा और भावनात्मक कमजोरियां यथार्थ और तर्क की जमीन से इतनी दूर कर देती हैं कि उसे अपने भ्रम सच लगने लगते हैं। कंचन सिंह और उसका परिवार ज्यादातर समय तंत्र-मंत्र और पूजा-पाठ में लगा रहता था। यहां तक कि मनोरंजन के नाम पर भी वह सिर्फ टीवी के धार्मिक कार्यक्रम देखता था। सवाल है कि उन्हें इस हाल में पहुंचाने के लिए कौन-सी स्थितियां जिम्मेदार थीं? क्या वजह थी कि वे यथार्थ तरीके से किसी चीज को देखने में असमर्थ हो गए?
कोई भी वैज्ञानिक चेतना संपन्न समाज या


उसे बढ़ावा देने वाला शासन अपनी सांस्कृतिक परंपराओं से अंधविश्वासों को दूर करने का हर संभव उपाय करता है। अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति या तर्कशील सोसाइटी जैसे संगठन अपनी ओर से अभियान चलाते हैं, मगर उनकी अपनी सीमा है। दूसरी ओर, बाबाओं और गुरुओं के अलावा जनता के बीच व्यापक पहुंच वाले तमाम टीवी चैनल सिर्फ अपनी कमाई के लिए पौराणिक कथाओं, ज्योतिष विद्या, तंत्र-मंत्र और पूर्व या पुनर्जन्म पर आधारित काल्पनिक कहानियों के जरिए अंधविश्वास बढ़ाने वाले कार्यक्रम धड़ल्ले से परोसते  और एक तरह से लोगों का भावनात्मक शोषण करते हैं। यह स्थिति किसी भी आस्थावादी व्यक्ति को अंधश्रद्धा की ओर धकेलती है। लेकिन सैन्य साजो-सामान से लेकर अत्याधुनिक प्रक्षेपण यान से संबंधित नए-नए प्रयोगों पर अरबों रुपए खर्च करने वाली सरकारों को न कभी इसके खिलाफ कोई ठोस पहल करना जरूरी लगा, न अपने स्तर पर वह ऐसा अभियान चलाती है, जिसके जरिए समाज को जागरूक बनाने का दावा किया जा सके। हमारी औपचारिक शिक्षा-दीक्षा जहां महज डिग्री हासिल करने का पर्याय बनी हुई है, वहीं सामाजिक विकास नीतियों में तर्क और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने को लेकर राजनीतिक इच्छाशक्ति का व्यापक अभाव दिखता है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि अंधविश्वासों के साथ जीने वाला समाज न सिर्फ पिछड़े, सामंती मूल्यों को ढोता है, बल्कि उसके आगे बढ़ने के रास्ते एक तरह से बंद रहते हैं। ऐसी घटनाओं को आमतौर पर पिछड़ी चेतना का नतीजा मान कर गुजर जाने दिया जाता है। लेकिन सच यह है कि कई बार संस्कृति के नाम पर ऐसी स्थितियों का भी पोषण किया जाता है, जो किन्हीं सामाजिक वर्गों या समुदायों के पिछड़े रहने की वजह होती हैं।

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