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दूरी और नजदीकी PDF Print E-mail
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Saturday, 30 March 2013 11:25

जनसत्ता 30 मार्च, 2013: समाजवादी पार्टी के मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ तल्ख तेवर की वजहें समझी जा सकती हैं। जैसे-जैसे आम चुनाव नजदीक आता जा रहा है, मुलायम सिंह को लगने लगा है कि कांग्रेस से नजदीकी उनके लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है। इसलिए पहले उन्होंने तीसरे मोर्चे का विकल्प सामने रखा। फिर होली वाले दिन पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए समय से पहले लोकसभा चुनाव होने की संभावना को रेखांकित करते हुए उन्हें इसके लिए तैयार रहने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार का माकूल सहयोग न मिल पाने की वजह से प्रदेश में कानून-व्यवस्था में सुधार और विकास संबंधी कार्यक्रमों में गति नहीं आ पा रही। उनके इस रुख पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी स्वीकार किया कि सपा समर्थन वापस ले सकती है। मगर इससे उनकी सरकार पर कोई असर नहीं पड़ेगा। इसी बीच वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने उत्तर प्रदेश में बैंकों की शाखाओं का उद्घाटन करते हुए अपने साथ मंच साझा कर रहे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कामकाज की खुल कर तारीफ की। फिर अगले ही दिन मुलायम सिंह यादव ने कहा कि उनकी पार्टी मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस नहीं लेगी, वह अपने ढुलमुल रवैए के चलते खुद गिर जाएगी। हालांकि उत्तर प्रदेश में सपा की मुख्य लड़ाई बसपा के साथ है, मगर उसके जनाधार में सेंध लगाने के लिए भाजपा और कांग्रेस की जोर- आजमाइश भी चलती रहती है। ऐसे में सांप्रदायिक ताकतों से दूरी बनाए रखने के लिए सपा की मजबूरी है कि वह कांग्रेस के साथ खुद को खड़ा करे। अब तक वह इसी आधार पर कांग्रेस का साथ देती आई है। मगर कांग्रेस को अपना जनाधार भी मजबूत करना है। इसलिए वह प्रदेश में सपा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने में गुरेज नहीं करती। प्रदेश


कांग्रेस समिति आम चुनाव के मद्देनजर अपनी रणनीति तैयार कर चुकी है। ऐसे में सपा के लिए कांग्रेस के साथ देर तक चलते रह पाना संभव नहीं है।
फिर कांग्रेस के साथ खड़े रह कर मुलायम सिंह का तीसरा मोर्चा बनाने का सपना कभी पूरा नहीं हो सकता। इसलिए भी वे मनमोहन सिंह सरकार से नाता तोड़ने का मौका तलाश रहे हैं। मगर तीसरा मोर्चा बनने की संभावना क्षीण है। यूपीए और राजग से बाहर के जिन दलों को जोड़ कर मुलायम सिंह इसे आकार देने का समीकरण बिठा रहे हैं, वे शायद ही एकजुट हो पाएं। दरअसल, इस मामले में खुद मुलायम सिंह का रवैया ढुलमुल रहा है। एक बार वे कुछ क्षेत्रीय दलों को जोड़ कर राष्ट्रीय गठबंधन बनाने का प्रयोग कर चुके हैं। मगर तब उन्होंने खुद यूपीए सरकार को बचाने के लिए गठबंधन धर्म को ताक पर रख दिया था। इसलिए दुबारा राष्ट्रीय मोर्चा बनाने की उनकी पहल दमदार नहीं रह गई है। कांग्रेस उनकी यह मजबूरी समझती है। इसलिए मनमोहन सिंह के इस दावे को समझा जा सकता है कि सपा समर्थन वापस भी ले ले तो उनकी सरकार या आर्थिक विकास संबंधी नीतियों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। फिर कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में अपनी जड़ें मजबूत जमानी हैं तो वह सपा सरकार की कमियों को निशाना बना कर ही किया जा सकता है। भले मुलायम सिंह दिल्ली में अपराध के आंकड़ों से तुलना करते हुए अखिलेश सरकार के कार्यकाल में हुए अपराधों को ढंकने की कोशिश करें, मगर यह शायद ही असरकारी साबित हो। अगर मुलायम सिंह सचमुच वैकल्पिक रास्ता तैयार करना चाहते हैं तो उन्हें सबसे पहले अपने राजनीतिक द्वंद्व से बाहर आना होगा।

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