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मुक्ति के सपने PDF Print E-mail
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Saturday, 23 March 2013 12:25

अविनाश पांडेय समर
जनसत्ता 23 मार्च, 2013: भगत सिंह का शहादत दिवस हर बरस इस दर्द के साथ आता है कि हमारी पीढ़ी के हिस्से में क्रांति के सिर्फ सपने आए, क्रांतियां नहीं। इस बार दर्द और बढ़ गया है। एक और क्रांतिकारी के चले जाने का दर्द। पर एक सुकून भी है कि भगत सिंह को न देख पाने वाली इन आंखों ने ऊगो चावेज को देखा है। स्मृतियों में तस्वीर के साथ दर्ज उस दिन सब कुछ लाल था। बारिश के बावजूद खचाखच भरे स्टेडियम में लहराते लाल झंडों और ऊगो चावेज की सुर्ख लाल कमीज से लेकर दहकते बोगनवेलिया तक, सब कुछ। वह एक जीते हुए क्रांतिकारी का दिन था जब मैंने उन्हें देखा और सुना था। घंटे भर से लंबे भाषण में महात्मा गांधी और नेहरू के लेखन से चुने हुए अतिक्रांतिकारी उद्धरणों से लेकर हवाओं में उछलते नारों का जवाब एक क्रांतिगीत गाकर देते हुए चावेज दोस्त ज्यादा लगे थे, वेनेजुएला के राष्ट्रपति कम।
जहां तक मुझे याद है, वहां केवल मैं मंत्रमुग्ध नहीं था, सबके चेहरे पर मेरे ही जज्बात तैर रहे थे। चावेज के उस भाषण ने मुझे और भी बहुत कुछ याद दिला दिया था। जीते हुए चावेज की स्मृति जाने क्यों बरसों पहले हार में भी गरिमा के साथ खड़े चावेज की यादों तक खींच रही थी। तब के उस लेफ्टिनेंट कर्नल चावेज की, जिसने क्रांति की विफल कोशिश और अपनी गिरफ्तारी के बाद बाकी बचे साथियों को हथियार डालने का संदेश देते हुए राष्ट्रीय टेलीविजन पर कहा था कि ‘अपने उद्देश्यों को पूरा कर पाने में अभी के लिए विफल रह गए हम लोग क्रांति को स्थगित कर रहे हैं कॉमरेड्स। अभी के लिए।’ चार फरवरी 1993 की वह उदास सुबह हारे हुए चावेज की सुबह थी, वेनेजुएला के आसमान में बहुत उदास सूरज के चढ़ने की सुबह थी। यों हार तब तक मुकम्मल नहीं थी, पर चावेज की उस लड़ाई के नतीजे बहुत साफ हो चुके थे। तमाम महत्त्वपूर्ण शहरों और सैनिक-औद्योगिक ठिकानों पर कब्जा कर चुकने के बाद भी उनके जियाले सबसे महत्त्वपूर्ण मोर्चा कराकास, यानी राजधानी जीत पाने में नाकाम रहे थे। क्रांति की शुरुआत होते ही अपना महल छोड़ भाग गए राष्ट्रपति कार्लोस अंद्रेज पेरेज ने सुबह ही टेलीविजन पर राष्ट्र के नाम संदेश में ‘तख्तापलट’ की कोशिश के कुचल दिए जाने की खबर देते हुए क्रांतिकारियों के कब्जे वाले मोर्चों पर हवाई हमले कर उनके साथ-साथ हजारों आम नागरिकों की जान ले लेने के अपने इरादे साफ कर दिए थे।
चावेज को एक फैसला लेना था और


वह उन्होंने लिया भी। सुबह दस बजे के पहले ही ‘षड्यंत्रकारी’ चावेज रक्षा मंत्रालय के मुख्यालय पर लाए गए थे और उनके सामने सवाल था कि सारे संवाद टूट जाने की स्थिति में अब भी लड़ रहे अपने साथियों को कैसे रोका जाए। ठीक उसी वक्त किसी बेवकूफ सैन्य अधिकारी को चावेज को राष्ट्रीय टेलीविजन पर यह संदेश देने को कहने का खयाल आया था। प्रस्ताव स्वीकारते हुए चावेज ने साफ कर दिया था कि वे न तो हथकड़ी पहनेंगे, न वर्दी उतारेंगे और न ही अपना संदेश पहले लिख कर देंगे। उसके बाद जो हुआ वह इतिहास है।
वेनेजुएला की जनता ने शायद पहली बार एक नेता को अपनी हार स्वीकारने और विफलता की पूरी जिम्मेदारी लेने का नैतिक साहस दिखाते हुए देखा था। उन्होंने पहली बार एक ऐसे सैनिक को देखा था जिसने अपने साथियों की जान बचने के लिए उन्हें रुकने का संदेश देने के पहले न केवल अपनी वर्दी ठीक की थी और बेरेट पहनी थी, बल्कि वेनेजुएला के लोगों को सुप्रभात भी कहा था!
उस सुबह चावेज के पास कुल बहत्तर सेकेंड थे। और वक्त के उस छोटे टुकड़े में उन्होंने क्रांति के सपने को वेनेजुएला के हर गरीब की आंखों का सपना बना दिया था। उन्हें यकीन दिला दिया था कि यह हार बस फिलहाल के लिए थी, यानी बस ‘अभी के लिए...।’ चावेज के चले जाने के बाद उन्हें तमाम तरह से याद किया जा सकता है। मार्क्सवाद और ईसाइयत के अद्भुत समन्वय वाली बोलिवेरियन क्रांति के अग्रदूत, मार्क्सवादी नवउभार के नायक, ‘दास कैपिटल’ के साथ-साथ बाइबिल निकाल लेने वाले चावेज, खुद को महाशक्ति कहने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश को शैतान कह कर पुकार सकने वाले चावेज, तेल के लिए होने वाली साम्राज्यवादी लड़ाइयों के दौर में उसी तेल को साम्राज्यवाद के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बना देने वाले राजनीतिक...! लेकिन मुझे ‘क्रांति स्थगित की जा रही है, अभी के लिए’ की घोषणा करने वाले चावेज सबसे ज्यादा याद आ रहे हैं, क्योंकि वही तात्कालिक हार के बीच क्रांति की अनिवार्य जीत का प्रतीक हैं, सर्वहारा संघर्षों की अग्निशिखाओं की अनश्वरता का जयघोष हैं। वही चावेज फिर से याद दिलाते हैं कि अवाम के लिए लड़ते हुए जान दे देना बड़ा काम है, पर उससे भी बड़ा है अवाम की मुक्ति के सपनों के लिए जीते और लगातार लड़ते रहना। यह वह जगह है जहां भगत सिंह के सपने चावेज के सपनों से मिल जाते हैं।

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