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खामोशी की चीख PDF Print E-mail
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Monday, 11 February 2013 11:14

अविनाश पांडेय समर
जनसत्ता 11 फरवरी, 2013: उस दिन जब मेरे दोस्त ने पूछा कि ‘पर केवल ओवैसी ही क्यों’ तो उसकी आंखों में गुस्सा नहीं, बस एक गहरा खालीपन था। गुस्सा तो वह शायद हो भी नहीं सकता था, क्योंकि बीते तीन दशक में धीरे-धीरे इस देश के सांप्रदायिक सहजबोध का हिस्सा बना दी गई तमाम रूढ़ियां इस प्यारे दोस्त के व्यक्तित्व के सामने ध्वस्त हो जाती हैं। भगवा हमलों के जवाब में बढ़ती जा रही टोपियों के दौर में रोजा के बीच भी शराबखोरी कर लेने और फिर याद आने पर हल्के से कुछ बुदबुदा कर माफी मांग लेने वाले इस दोस्त का होना भर न सिर्फ इस मुल्क में गंगा-जमनी तहजीब के जिंदा होने का सबूत है, बल्कि वहाबी इस्लाम के सूफी इस्लाम को खारिज करने की कोशिशों के एक दिन विफल हो जाने की उम्मीद भी।
हमने उसे अब तक ‘इस्लाम खतरे में है’ के नारों पर हंसते देखा है। यह भी कि कैसे उसने मौलानाओं को बड़ी गंभीरता से सुनने के बाद धीरे से पूछा कि ‘मियां, ये सब तो ठीक है। पर आप ये बताइए कि मस्जिदों पर ज्यादा हमले कहां होते हैं, हिंदुस्तान में या पाकिस्तान में? ये बताइए कि जिहादियों के हाथो ज्यादा कहां के मुसलमान कत्ल किए जाते हैं?’ और फिर स्तब्ध खड़े मौलाना को यह कहते हुए भी कि ‘मियां, इस्लाम खतरे में तो है, मगर इस पार नहीं, उस पार! वहां बचा लीजिए, यहां अपने आप बच जाएगा!’
हमने इस दोस्त की आंखों में कौम के स्वयंभू ठेकेदारों के खिलाफ गुस्सा ही देखा था, फिर वह चाहे हिंदू हों या मुसलमान। हमारी साझेदारियों में इससे पहले ओवैसी और उनकी पार्टी मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन सिर्फ एक बार आए थे। वह भी तब जब उन्होंने प्रख्यात बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन पर हमला किया था और भारत के एक बहुत प्रगतिशील समझे जाने वाले शिक्षण संस्थान जेनयू में मुसलिम कट्टरपंथियों के इस हमले पर पसरी गहरी चुप्पी के बीच हमने उनके खिलाफ पोस्टर चिपकाए और परचे बांटे थे।
ऐसा भी नहीं कि हम हमेशा एक दूसरे-से सहमत ही रहे हों। सच कहें तो भारत में इस्लाम पर लगातार बढ़ रहे दक्षिणपंथी हमले को लगभग खिलंदड़ाना अंदाज में खारिज कर देने की उसकी आदत हमारे बीच लगातार होने वाली लड़ाइयों का सबब बनती रही थी। हमें लगता था कि उसका इस मुल्क की जनता के अमनपसंद होने पर बहुत गहरा यकीन कई बार उसे गहराते जा रहे संकट को देखने नहीं दे रहा। आप गुजरात कहें और वह कहता कि यही वजह है कि भाजपा दुबारा कभी इस देश


की सत्ता में नहीं आ पाई! आप दंगाइयों को अब तक सजा न मिलने के बारे में पूछें और अदालतों पर यकीन से लैस वह बताएगा कि वे बच नहीं पाएंगे। आप सच्चर समिति की रिपोर्ट का जिक्र करें और वह कहेगा कि बरखुरदार, हालात इतने संगीन होते तो ये ‘बेजुबान’ प्रधानमंत्री कभी यह दावा न कर पाते कि वैश्विक जिहाद में किसी हिंदुस्तानी मुसलमान के शरीक न होने पर उन्हें गर्व है।
ऐसा भी नहीं कि उसके इस यकीन का छीजना हमें दिखा नहीं था। शहर बदल जाने के बाद आभासी दुनिया में गाहे-बगाहे मुठभेड़ हो जाने पर पूछे जाने वाले उसके सवालों में एक गहरी खामोशी और उदासी थी। बाल ठाकरे की मृत्यु के बाद उसने पूछा था कि इन्हें भी तिरंगे में लपेट दिया मियां! ये तो मुसलमानों को कैंसर कहते थे न? उसे अब तक सांप्रदायिकता की आग के सामने अमन की मिसाल बन कर खड़े पूर्वी उत्तर प्रदेश से आने पर गर्व था। राम मंदिर आंदोलन के चरम दौर में भी इस इलाके में दंगा करवा पाने की विफल कोशिशें उसे इंसानियत के जिंदा होने का सबूत लगती थीं। पर फिर धीरे-धीरे यह इलाका भी बदलने लगा था। हमें इस इलाके की हवाओं में फिरकापरस्ती का जहर घोलने की कोशिश कर रहे लोग अपने इरादों में कामयाब होते नजर आने लगे थे। रमजान काका का ‘राम-राम’ भगवा झंडों वाले ‘जय श्रीराम’ में कब और कैसे बदल गया, यह हम दोनों साथ-साथ और साफ देख पा रहे थे। उसने एक बार कहा भी था कि ये योगी आदित्यनाथ जैसे लोग और उनके खिलाफ कार्रवाई न करने वाली सरकारें ही हैं जो मुख्तार अंसारियों को मुसलमानों का नेता बना देती हैं। इसे रोकना ही होगा।
इस बार उसने और किसी का जिक्र नहीं किया। इतना भर पूछा कि ‘सिर्फ ओवैसी क्यों!’ अब शायद एक बार फिर उसे इस सवाल के बरक्स ‘अपना’ जवाब मिल गया हो कि मियां, विनय कटियार भी!
इसके बावजूद मुझे उसकी खाली, भावहीन आंखों में सवाल से बचने की कोशिशों के नतीजे दिख रहे थे। ‘सबके साथ न्याय’ ही देश को देश बना कर रखता है। एक समुदाय को न्याय से वंचित रखने की कोशिशें न केवल मजहबी कट्टरपंथ को जन्म देती हैं, बल्कि उस समुदाय के भीतर की अमनपरस्त आवाजों को जिबह भी कर देती हैं। और, किसी भी धर्म के भीतर बैठे चंद मजहबी कट्टरपंथियों से लड़ना आसान है, पर पूरे समुदाय के हारे हुए यकीन से नहीं।

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