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सांस्कृतिक कूटपद PDF Print E-mail
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Wednesday, 02 November 2011 11:34

शचींद्र आर्य

जनसत्ता, 2 नवंबर, 2011 : बचपन में जिस दिन का सबसे ज्यादा इंतजार रहता था, वह दिवाली सिर्फ एक दिन बन कर क्यों रह गई, समझ नहीं आता।

उसके बीतने के बाद उन सारे तंतुओं का अंदर तक झंकृत न हो पाना अजीब-सा अहसास है, जिसके लिए अभी कोई शब्द आसपास नहीं मिल पा रहा। अगर संस्कृति अपना पुनरुत्पादन करती है और समाज के स्थायित्व के लिए सबसे जरूरी जैविक कारक है, तो उसके लिए वह संघर्ष भी अपने तरीके से करती है। उसे अपने सारे सांस्कृतिक चिह्न, प्रतीक, बिंब, रूपक कूटपदों में बदलने पड़ते हैं। यह दोतरफे संप्रेषण की भांति काम करता है; कोडिंग डी-कोडिंग! संस्कार, रीति-रिवाज, परंपराएं, त्योहार- ऐसे ही सशक्त सांस्कृतिक कूटपद हैं, जिन्हें विखंडित कर आसानी से उस सांस्कृतिक क्षेत्र में घुसपैठ की जा सकती है। पर इन कूटपदों के विखंडन की प्रक्रिया इतनी सरल रेखा में नहीं चलती।
प्राथमिक समाजीकरण हमारे अंदर परिवार नामक एजेंसी के माध्यम से इन कूटपदों को भरता है, उसके अर्थों के साथ। इन्हीं प्रतीकों को जब पूंजीवादी माध्यम इजारेदार कंपनियों के लिए हमारी तरफ संप्रेषित करता है, तो हमें उनसे जुड़ जाना स्वाभाविक क्रिया लगती है। जबकि वे योजनाबद्ध तरीके से आपको अपनी झोली में लपक लेते हैं। भरी हुई जेब के साथ। मतलब ‘जब’ आप कोई ‘शुभ’ ‘काम’ करने जा रहे हों, तो ‘दही’ का स्थानापन्न, किसी विदेशी कंपनी की ‘चॉकलेट’ को हो जाना चाहिए। यहां एक-एक शब्द पर जरा थोड़ी देर रुक कर गौर कीजिए और उन्हें सुनने की कोशिश कीजिए कि कौन-से सांस्कृतिक पद कान में पड़े। यहां मिठाई ऐसा ही एक और ‘डीएनए’ है। दिवाली के समय में ही सबसे ज्यादा मिलावटखोरी की खबरें छाई रहती हैं। इसे सवाल की तरह भी पूछा जा सकता है कि जो माध्यम इसकी मार्केटिंग नहीं करते, वे इस जातीय स्वाद के बाजार भाव पर पलीता किसी छिपे एजेंडे के तहत तो नहीं लगाते! जबकि सोपानीय क्रम यहां भी है। कलेवा, हल्दीराम, नत्थू की मिठाइयां अपनी शुद्धतम अवस्था में पूरे साल बनी रही हैं।
पर जो बात


छूटी जा रही है वह यह है कि मिलावट को सिर्फ मांग-पूर्ति की अर्थशास्त्रीय दृष्टि से देखना एकांगी होगा, जबकि वहां संस्कृति अपने अस्तित्व की लड़ाई भी लड़ रही होती है। उसे हमेशा नुक्कड़ की दुकान पर बने रहना होगा। वह अपने को दोहराती रहना चाहती है। वरना जैसे चाय के साथ ‘पारले-जी’ बिस्कुट की अनिवार्य उपस्थिति होती है, पोहा भी जलेबी की जगह किसी को ढूंढ़ लाएगा। इसे दूसरी तरह देखें तो पश्चिम बंगाल में आज तक रसोगुल्ला, संदेश, पीठा, फिरनी वहां की मिठाई की दुकानों पर पाए जाते हैं।
यही नहीं, हर साल जितने भी बच्चे पटाखे बनाते हुए विस्फोटों में मारे जाते हैं, वे भी अपना योगदान इसी पुनरुत्पादन में देते हैं! यह चित्र थोड़ा हिंसक किस्म का लग सकता है, पर जहां दीपावली का मतलब आतिशबाजी करना है, वहां इस भूमिका से बचा नहीं जा सकता है। अगर आप उनमें हैं तो खरीदे हुए पटाखों में दो-चार बच्चों की जिंदगी भी जोड़ लीजिए। पता नहीं, हम इस कीमत पर खुद तो रोशनी की तरफ जा रहे हैं, पर उस उजाले की चकाचौंध में कुछ भी देख पाने में असमर्थ हैं।
यहां सवाल मेरे लिए है कि बचपन की उन यादों के गहरे धंसे होने के बाद भी आज इस दिन को ऐसे बिताने के सिवा कोई और विकल्प सामने नहीं दिख रहा। यह भी नहीं समझ पाता कि यह दिन और दिनों से किन संदर्भों में अलग है। उन मिथकीय उपाख्यानों की परिधि में इसे न कल देखते थे, न आज। महर्षि दयानंद के निर्वाण दिवस पर रामलीला मैदान जाना कब का पीछे छूट गया। एक वार्षिक सफाई अभियान शुरू होता था, वह इधर कई सालों से सफेदी न होने के कारण नेपथ्य में चला गया है। आज सिर्फ किताबों की आलमारी को व्यवस्थित कर काम तमाम। ले-देकर चीनी बल्बों की लड़ियों के साथ दीए जला रात छत पर दूसरों की आतिशबाजी देखना बचा है।

 

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