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गुलों में दहशत PDF Print E-mail
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Monday, 29 October 2012 11:36

भरत तिवारी
जनसत्ता 29 अक्टुबर, 2012: शहर में दंगा हुआ है!’ यह खबर आई मेरे जन्मस्थान से। इस बात पर मुझे गर्व था कि ‘हमारे शहर में यह सब नहीं होता, भले ही खबरों में रहता हो शहर फैजाबाद।’ मगर खबर सुनी तो होश फाख्ता हो गए। घर से छह सौ किलोमीटर दूर देश की राजधानी में बैठा मैं समझ नहीं पा रहा था कि अपने दिमाग को कैसे समझाऊं। दंगे-फसाद की खबरें देश-विदेश गांव-शहर सब जगहों से आती रहती हैं। लेकिन ‘फैजाबाद में सांप्रदायिक दंगा!’ दिमाग बहुत सारी ऐसी परिस्थितियों को लेकर भी सजग होता है जो उस पर कभी नहीं गुजरी हो, लेकिन इसके लिए मेरा दिमाग कतई तैयार नहीं था। धड़कनों का बढ़ना और शरीर का कांपना वाजिब था। सन्निपात-सी स्थिति से बाहर आने में पांच-सात मिनट लगे।
मैं एक हाथ से घर फोन मिला रहा था और दूसरे से टीवी रिमोट के बटन दबा कर खबरों में खोज रहा था। निराशा हाथ आई। फोन पर सुनने के बावजूद विश्वास नहीं हो रहा था कि जिस शहर में कभी ऐसा नहीं हुआ, वहां यह हुआ तो हुआ कैसे! इंटरनेट पर तलाशा तब खबर नजर आई। एक और पुष्टि कि तुम्हारे उस शहर में सांप्रदायिकता के जानवर ने अपने नाखून गड़ा दिए हैं जहां के लोगों ने इस जानवर को कभी रोटी भी नहीं दी थी। अब अपने दोस्तों को किस मुंह से फोन करूं, लेकिन कैसे नहीं करूं? फोन करने पर पहली बार इस बात का अहसास हो रहा था कि एक हिंदू एक मुसलिम दोस्त से बात करने जा रहा है... एक जानलेवा अहसास! दुबारा इस अहसास से गुजरने से बेहतर होगा कि मैं ही गुजर जाऊं।
हम नहीं बने हैं इसलिए! कैसे हम खुद को सौंप देते हैं ऐसे लोगों के हाथों जो हमें इस आग मे झोंक कर अपनी रोटियां सेंकते हैं? खुद को समझदार कहने और


समझने वाले ‘हम’ कितने बड़े मूर्ख हैं? अगर हाथ उठाने को कहा जाए और पूछा जाए कि हममें से कौन नहीं जानता कि दंगों-फसादों के पीछे कौन होता है, तो सबके हाथ खड़े होंगे। सब जानते हैं कि यह काम न तुम्हारा है न मेरा, बल्कि उसका है जो बगैर हाथ खड़ा किए अपनी आवाज के दम पर बताता है कि यह काम एक ‘जाति विशेष’ का ही है। क्या हम सिर्फ उसकी आवाज की तेजी भर से उसके झूठ को नहीं पकड़ पाते? बड़े समझदार हैं हम!
यह ‘वही’ है जो ऐसी घिनौनी चालें रचता है और जिसका ‘काम’ (धंधा) या रोजी-रोटी इसी से चलती है। वह, ‘जो मजहबों के नाम पर दंगे करा रहा है/ उसकी दुकां का नाम सियासत है सियासत...!’ उसे अगर फैजाबाद जैसे शहर में नाखून गड़ाने का मौका मिला है तो यह बेहद शर्मनाक है। यह फैजाबाद में रहने वाले हर इंसान को समझना होगा कि उसके हाथ काटना, उसे बाहर धकेलना जरूरी है। वह मानव-बम है जिसकी मानसिकता विक्षिप्त है, जिसकी जात, जिसका धर्म भाईचारा मिटाना है और जिसे कुर्सी पर बैठने का लालच इस कदर है कि वह शहर में आग लगाने से भी बाज नहीं आया।
कुछ दिनों पहले एक गजल लिखी थी तब यह नहीं सोचा था कि उसका संदर्भ ऐसे कहीं जुड़ेगा- ‘ये कैसा मौसम बना रहे हो/ गुलों में दहशत उगा रहे हो/ धरम को पासा बना रहे हो/ ये खेल कैसा खिला रहे हो/ खुद तो घुटनों पे चल रहे हो/ संभलना हमको सिखा रहे हो/ जमीर जाहिल बना हुआ है/ ये इल्म कैसा सिखा रहे हो/ हक तो ये है तुम आज नाहक/ गुलों पे ये हक जमा रहे हो/ खुली हैं आंखें ‘शजर’ है जिंदा/ क्यों अपनी शामत बुला रहे हो।’

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