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समंदर-सी आवाज PDF Print E-mail
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Friday, 26 October 2012 11:16

भरत तिवारी
जनसत्ता 26 अक्टुबर, 2012: संगीत शब्द ही अपने आप में बेहद सुरीला है। आमतौर पर हममें से शायद ही किसी को याद हो कि वह कौन-सा गाना, गजल या गायक था जो हमारे दिल में सबसे पहले उतरा था। लेकिन अगर याद है तो भी यह बात मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि वह आज भी दिल के उसी कोने में बैठा होगा- कभी नहीं जाने के लिए। मैं छोटा बच्चा था। तब लगभग छह-सात साल की उम्र होगी। एक छोटे-से शहर में रहता था। बाकी बच्चों की तरह मेरी भी अपनी बदमाशियां थीं और मुझे भी संगीत सुनना अच्छा लगता था। घर में एक रिकार्ड प्लेयर था। बहुत सारे रिकार्ड भी थे। पिताजी को अक्सर अपनी सरकारी नौकरी के सिलसिले में राजधानी जाना पड़ता था। यह सुनते ही कि पापा लखनऊ जा रहे हैं, खुशी छलांग मार कर अंदर कूद जाती थी। जब तक रात में पिताजी वापस नहीं आ जाएं वे कुछ नहीं करने देती थीं, सिवा इंतजार के। यहां तक कि गली में खेलने का भी मन नहीं होता था।
खैर, उस दिन पिताजी लखनऊ से रात नौ बजे वापस आए। उनके आने के बाद बस यह जानने की जल्दी लगी रहती थी कि वे आज कौन-सा रिकार्ड लेकर आए हैं। उस रात रिक्शे पर तीन बड़े-बड़े डिब्बे रखे थे। यह देख कर दिल के भीतर की खुशी ने बाहर छलांग लगा दी और जा चढ़ी रिक्शे पर। तीनों डिब्बों पर ‘एचएमवी’ लिखा था। रात में पापा ने कहा कि ये सुबह ही खुलेंगे और आप लोग अभी सो जाएं। यह उस आवाज में कहा जाता था जिसका मतलब होता था कि जवाब नहीं देना है। बस सुनें और करें! जब सुबह बैठक में डिब्बे खुले और उनके अंदर का सब सामान फिट हुआ और तो सामने नया रिकार्ड प्लेयर था, जिसके साथ दो स्पीकर अलग से थे। नया रिकार्ड भी आया था। उसे चलाया गया। उसमें जो आवाज निकली उसे सुन कर लगा कि यह आवाज कभी सुनी तो नहीं है, लेकिन यह ऐसी आवाज थी कि मैं बस उसमें डूब गया। रिकार्ड का नाम था ‘दि अनफॉरगेटेबल्स’ और गायक थे जगजीत सिंह। कब और कैसे वे एक छह साल के बच्चे के इतने प्रिय हो गए, यह तो मुझे भी नहीं पता, बस इतना जानता


हूं कि उसके बाद उनकी आवाज से जो मुहब्बत हुई, वह शायद अब मेरे साथ ही जाएगी।
उम्र बढ़ती गई, नए रिकार्ड आते गए। फिर कैसेटों का जमाना आ गया और कैसेट प्लेयर से ज्यादातर उनकी ही आवाज आती रहती थी। अगर इस तरह मेरी जिंदगी में जगजीत नहीं आए होते शायद मैं कभी भी गजलों से प्रेम नहीं कर पाता। मेरे लिए गालिब ठीक वैसे ही जगजीत सिंह का एक नाम है, जैसे निदा फाजली, सुदर्शन फाकिर...! यह मैं किसी को बुरा लगने के लिए नहीं कहता, लेकिन मेरे लिए यही सच है। इन्हें और उन सबको, जिनके लिखे गीतों और गजलों को जगजीत सिंह ने गाया, मैं सिर्फ इसी वजह से जानता हूं।  फिर जब दिल्ली में बसेरा हो गया और एक सुबह अखबार में पढ़ा कि जगजीत सिंह यहां सिरीफोर्ट में आने वाले हैं और यहां वे गाएंगे भी तो जाने कहां-कहां से पैसे निकाले, टिकट खरीदा और उन्हें सुना। उनके सामने ऐसा लगा कि कोई मखमल का इंसान मखमल-से गले से अपनी मखमली आवाज के धागे पूरे हॉल में फैला रहा हो। हम उस रात और ज्यादा उनसे बंध गए। फिर कोई मौका नहीं छूटा कि वे दिल्ली में आएं और हम उन्हें सुनने न जा पाएं।
पिछले साल दिल्ली के सिरीफोर्ट आॅडिटोरियम में छब्बीस फरवरी को उनका सत्तरवां जन्मदिन था और उनके संगीत जीवन के पचास वर्ष पूरे होने के मौके पर एक आयोजन था। मंच पर उनके साथ पंडित बिरजू महाराज और गुलजार भी थे। लेकिन क्या पता था कि उस दिन उन्हें आखिरी बार देख रहा था। शायद दिल्ली में वह उनका आखिरी कार्यक्रम था। महज सात महीने बाद, जिस मौसम में दिल्ली की गलियां गुलबहार हो जाती हैं, दस अक्तूबर को उनके सब कुछ छोड़ कर दुनिया से विदा हो जाने की खबर आई। उस वक्त मेरी जुबान से बस इतना निकल सका था-  ‘किसी गफलत में जी लूंगा कुछ दिन/ तेरे गीतों में मिल लूंगा कुछ दिन/ अभी आई है खबर, बहुत ताजा है/ अभी अफवाह समझ लूंगा कुछ दिन...।’ कोई दिन नहीं गुजरता जब उन्हें न सुना जाए। जगजीत सिंह उस सात साल के बच्चे के दिल के उसी कोने में आज भी बैठे हैं- कभी नहीं जाने के लिए!

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