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Tuesday, 14 February 2012 09:55

शचींद्र आर्य
जनसत्ता 14 फरवरी, 2012: दिमाग रुक-सा गया है। कुछ समझ नहीं पा रहा कि कैसे कहां खुद को स्थित कर इस उलझन से बाहर निकल सकूं। कोई हाथ भी नहीं है जो इस तरफ बढ़े। ऐसा क्यों हुआ और मेरी भूमिका क्या रही, जैसे भारी-भरकम सवालों से जूझना नहीं चाहता। ऐसा भी नहीं है कि जो कभी महसूस हुआ, उसे कभी प्रकट नहीं किया। पर हां, कभी उसे पता भी नहीं चल सका, क्योंकि सामने सफेद कागज होता था और नीली स्याही। उस जीवित हांड़-मांस के जीवित पिंड को कानो-कान खबर भी नहीं पड़ती। फिल्मों ने कुछ इस तरह संस्कारित किया कि उसका नंबर जुटाने के लिए बहाने तो खूब बना लेता था, पर जब उधर से लाइब्रेरी में उसने अपने जन्मदिन की बात कही तो इधर से फोन की इतवारी छुट्टी मान चुपचाप बैठा रहा। अगली सुबह मेट्रो में देख भी लिया, पर पास जाने की हिम्मत नहीं पड़ी। हां, अपनी फिलोसॉफी की किताबों पर कुछ-कुछ लिख कर उसे भेंट जरूर कर गया था।
आज की ये छोटी-छोटी बातें तब इतनी छोटी नहीं लगती थीं। ऐसा नहीं है कि मैंने कोशिश नहीं की थी। उस आखिरी साल अपनी सारी ऊर्जा को समेट सब कुछ कहने-बताने की तैयारी में रातें घड़ी की सुइयों को अपने चक्कर लगाती देखती-सुनती रहती थीं। किसी पटकथा लेखक की तरह सोचता था कि अगर उसे सीधे कहने में संकोच हो, तो वह किसी निश्चित दिन किसी विशेष रंग का सलवार पहन कर आ जाए, मैं समझ जाऊंगा। लेकिन आखिरी दिन भी चला गया। डेढ़ साल बाद खुद को दुबारा जुटाया। फोन मिलाया। उधर से आवाज आई- ‘यह नंबर मौजूद नहीं है।’
कोई ऐसी बात नहीं कहने जा रहा हूं कि एमए में पढ़ने वाला कोई प्रेमी तत्काल अपने प्रेम से इस्तीफा दे दे। मेरे पचपन फीसद नहीं बने तो क्या हुआ, उसके जरूर हो जाएंगे। अब तो ‘सेमेस्टर’ भी आ चुका है। उसे कौन-सा फिलासॉफी विभाग का चक्कर काटना है! न कोई अबोली आखिरी मुलाकात साहित्य अकादेमी की लाइब्रेरी से


निकलते हुए मंडी हाउस होते हुए तिलक ब्रिज से ईएमयू पकड़ने वाली है। इतना हो जाने के बाद भी मेरे पास उसे बताने के लिए बहुत कुछ था, पर उस रात की आखिरी मेट्रो आ चुकी थी।
फिर शुरू हुई कक्षाएं। बोलना यहां भी अनुपस्थित था, पर कभी नहीं लगा कि कुछ बोला जाना चाहिए। मेरी चलती डायरी में अपने बारे में लिखा पढ़ कर उस दुपहरी बस में उसने पता नहीं मेरे बारे में क्या सोचा होगा। पर मैं तो सन पचास की कहानियों के नायक की भूमिकाओं को अपने पास देख पा रहा था। जब भी मैं उसकी तरफ देखने की कोशिश करता, लगता उसकी आंखें मुझमें जाने क्या पढ़ रही हैं! उस सुबह बस स्टैंड पर वे महाशय पूछ बैठे कि मैं दक्षिण भारत का रहने वाला तो नहीं! मैंने मना कर दिया। पर शायद उसे नहीं कर पाया।
वह सुबह मुझे आज भी याद है, जब हम दोनों रिक्शे पर बैठे थे और अचानक मैंने कहा कि मैं तुमसे वही कहना चाहता हूं जो एक लड़का एक लड़की को कहना चाहता है। इस बोलने से पहले डर भी था एक दोस्त को खो देने का। इतनी कम एकांतिक मुलाकातों के बावजूद मैं खुद उन अर्थों को नहीं ढोना चाहता था, जिसका बोझ मुझे उठाना पड़ा। पता नहीं कैसा भावातिरेक था, जिसने तुम्हें अपने लिखे को न फाड़ने को कहा था। शायद कभी आगे जब हम दोनों साथ होते, तब मैं खुद को उनमें खोजता। उन्हीं दिनों सोचता था कि जब मेट्रो फरीदाबाद तक जाएगी, तुम्हें वहां तक छोड़ने जाया करूंगा। वह अब तक नहीं पहुंच पाई है।
एक रात खतरनाक किस्म का सपना देखा। सोचता था कि सच हो जाए। वह सड़क किनारे लालबत्ती पर रुकती गाड़ियों के आगे-पीछे भाग रही थी। एक दिन मुझे दिखी और अधकचरे कपड़ों के साथ उसे घर ले आया। माता-पिता को सिर्फ इतना पता चल पाया कि कॉलेज में साथ पढ़ते थे।

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