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दक्षिणी सिल्क रोड पर मोदी का समर्थन चाहते हैं शी चिनफिंग PDF Print E-mail
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Tuesday, 16 September 2014 08:42



सी राजा मोहन

तेंगचोंग (युन्नान)। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग बुधवार को जब भारत पहुंचेंगे तो निस्संदेह वे म्यांमा व बांग्लादेश के रास्ते भारत को जोड़ने वाले दक्षिणी सिल्क रोड को पुनर्जीवित करने की अपनी जोरदार कोशिशों में भारत को शामिल करने के बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से चर्चा करेंगे। अभी यह साफ नहीं है कि उनकी इन कोशिशों को मोदी का समर्थन मिलेगा या नहीं। पर एक चीज तय है कि चीनी राष्ट्रपति इस पर चर्चा जरूर करेंगे। और सिल्क रोड को पुनर्जीवित करने का शी का सपना अगर साकार हुआ तो चीन व म्यामां की लंबी सीमा पर स्थित सीमाई कस्बा तेंगचोंग इसकी अहम कड़ी साबित होगा।  

डेढ़ साल पहले चीन के राष्ट्रपति का पदभार संभालने के बाद से ही शी लगातार सिल्क रोड को पुनर्जीवित करने की दिशा में जोर शोर से जुटे हुए हैं। यह उनकी चीन की सीमा से सटे देशों को जोड़ने की कोशिशों के केंद्र में है। पिछले ही हफ्ते ताजिकिस्तान दौरे के समय उनकी इस पहल को चीन व मध्य एशिया के बीच सिल्क रोड औद्योगिक क्षेत्र के निर्माण पर समझौते से खासा बल मिला।

शी इसी हफ्ते मालदीव व श्रीलंका की यात्रा के दौरान भी दक्षिणी चीन और हिंद महासागर को जोड़ने वाले नौवहन सिल्क रोड के विकास पर भी चर्चा करेंगे। शी खास तौर से दक्षिणी सिल्क को पुनर्जीवित करने को लेकर उत्सुक हैं जिसे बीसीआइएम (बांग्लादेश, चीन, म्यांमा, भारत) कारिडोर के नाम से जाना जाता है। 

हालांकि जमीनी स्तर पर भारत हमेशा से तेंगचोंग की स्मृतियों का हिस्सा रहा है और भविष्य की योजनाओं में भी उसका अहम स्थान है। स्थानीय टूर आपरेटरों के मुताबिक युन्नान की राजधानी कुनमिंग यहां से 700 किलोमीटर दूर है जबकि उत्तरी म्यांमा का शहर म्यितक्यिना महज 50 किलोमीटर दूर और दक्षिण पश्चिम में स्थित भारतीय सीमा महज छह सौ किलोमीटर के फासले पर है। युन्नान और इसके उत्तर पूर्व में स्थित चीन की मुख्य भूमि में बहुत लंबा फासला है। तभी तो भारतीय उपमहाद्वीप के साथ व्यापार हमेशा से तेंगचोंग के अतीत का हिस्सा रहा है। यह दक्षिणी सिल्क रोड के बीचोंबीच स्थित है जो प्राचीन काल में चीन की राजधानी जियान से होकर भूमध्य सागर तक जाने वाले उत्तरी सिल्क रोड से भी ज्यादा पुराना है। 

दक्षिणी सिल्क रोड सदियों तक फलता फूलता व्यापारिक मार्ग था। विभिन्न चीजों से लदे घोड़ों के लंबे लंबे कारवां तिब्बत, सिचुआन, युन्नान, उत्तरी म्यांमा और पूर्वी भारत तक कारोबार करते थे। इनके मार्फत इस विशाल दुर्गम भूभाग में सिर्फ व्यापार ही नहीं बल्कि विचारों का भी आदान प्रदान होता था। व्यापारियों के साथ कारवां में बौद्ध भिक्षु भी होते थे।  

चीनी साम्राज्य की सीमा पर स्थित युन्नान में दूरदराज के इलाकों से व्यापार व वाणिज्य यहां के जनजीवन का केंद्रीय तत्व था। लोककथाओं के मुताबिक पहले यहां का कोई युवक विवाह करना चाहता था तो अपनी पात्रता साबित करने के लिए उसे किसी कारवां के साथ पहले दूरदराज के इलाकों में व्यापार के


लिए जाना पड़ता था।

यहां तक कि 19वीं सदी की शुरुआत में भी तेंगचोंग का कारोबार दक्षिणी चीन में स्थित कैंटन से कई गुना ज्यादा था। पर कैंटन आज चीन के वैश्विक कारोबार के बड़े केंद्रों में शुमार है। बर्मा पर कब्जा करने के बाद 20वीं सदी की शुरुआत में अंग्रेजों ने तेंगचोंग में एक वाणिज्य केंद्र खोला। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय ध्वस्त हो गई इस केंद्र की इमारत का स्थानीय सरकार अब पुनरुद्धार कर रही है। 

ब्रिटिश सरकार ने 19वीं सदी में बर्मा के रास्ते युन्नान को रेल व सड़क से जोड़ने की संभावना पर कई बार विचार किया पर पैसे की तंगी के कारण इस पर अमल नहीं हो पाया। 1940 के दशक में जापानी कब्जे के खिलाफ जंग के दौरान स्टिलवेल रोड और भारत की भूमिका भी लोगों के जेहन में ताजा है। असम के लेडो से शुरू होकर बर्मा के रास्ते युन्नान तक जाने वाली यह सड़क तेंगचोंग के बीचोंबीच से होकर गुजरती है। 

द्वितीय विश्वयुद्ध के समय मित्र देशों के सहयोग से बनाई गई इस सड़क ने युन्नान में फंसी चीन की राष्ट्रवादी सेना के सैनिकों तक रसद पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई थी। तेंगचोंग के लोग भूले नहीं हैं कि पूर्वी भारत के वायुसैनिक अड्डों से जापानी सेना के ठिकानों पर बमबारी ने युन्नान को जापानी कब्जे से मुक्त कराने में कितनी अहम भूमिका निभाई। 

युन्नान 2002 से एक बार फिर बेजिंग के राडार में आया जब चीन ने ‘गो वेस्ट’ नीति पर अमल करना शुरू किया। चीन के पूर्वी तटीय हिस्से के मुकाबले गरीब और पिछड़े युन्नान के अंदरूनी इलाकों के विकास पर बेजिंग ने अरबों डालर की रकम झोंकनी शुरू की। 

शी की सिल्क रोड की इस पहल का मकसद चीन के इस सीमाई इलाके को उसके आस पास के देशों के परिवहन मार्गों और व्यापारिक केंद्रों से जोड़ना है ताकि विदेशी बाजारों के साथ कारोबार से इस इलाके का पिछड़ापन दूर किया जा सके। हालांकि हाल के वर्षों में युन्नान का दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों के साथ परिवहन संपर्क में तेजी से सुधार हुआ है पर भारतीय उपमहाद्वीप के साथ संपर्क बढ़ाने के मोर्चे पर खास प्रगति नहीं हो पाई है। 

बेजिंग काफी समय तक भारत पर इस परियोजना में शामिल होने का दबाव डालता रहा पर यूपीए सरकार ने अपने कार्यकाल के आखिरी साल में बांग्लादेश और म्यांमा के साथ औपचारिक रूप से इस प्रस्ताव पर विचार करने पर सहमति जताई। अब चारों देशों को मिलकर यह तय करना बाकी है कि इस पर आगे कैसे बढ़े। 

हाल फिलहाल तक भारत इस प्रस्ताव को एक संकीर्ण कूटनीतिक नजरिए से देखता रहा है। पर बीसीआइएम कारिडोर पर मोदी कोई साहसिक रुख अपना सकते हैं जिससे भारत के सीमाई इलाकों और साथ लगते पड़ोसी देशों के साथ व्यापार व संपर्क को बढ़ावा मिल सके। तेंगचोंग और युन्नान तो इसके लिए उत्सुक हैं ही। 

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