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पेड़ का साथ PDF Print E-mail
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Tuesday, 06 August 2013 10:23

सुमेरचंद
जनसत्ता 6 अगस्त, 2013: कुछ समय पहले उत्तराखंड में आई आपदा पर बहुत कुछ कहा गया। मुख्य कारण बताया गया कि यह प्रकृति के साथ हद से ज्यादा छेड़छाड़ का नतीजा है। यही सही भी है। देश आजाद होने से पहले अपने देश का ज्यादातर भाग पेड़ों से भरा था। हर गांव का अपना जंगल होता था। सड़कों, नहरों, बरसाती नालों के किनारे पेड़ लगे होते थे। पहाड़ियां पेड़ों से ढकी होती थीं। कुएं और जोहड़ पर पीपल या बरगद के पेड़ लगे होते थे। सभी बड़े नगर में कंपनीबाग होता था। गांव में खेतों की मेड़ पर पेड़ होते थे, जहां दोपहर में हल में चलने वाले बैलों को चारा खिलाया जाता था। हरे पेड़ को काटना ‘पाप’ की तरह देखा जाता था। बदले में प्रकृति भी हम पर मेहरबान रहती थी।
1980 के दशक से पहले देश के लोग आमतौर पर पर्यावरण शब्द से परिचित भी नहीं थे। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद जब 1950 में राष्ट्रपति बन गए तो एक बड़े चिंतक कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के पास वन विभाग आया। उन्होंने देखा कि पेड़ों को धड़ाधड़ काट कर जंगलों को साफ किया जा रहा है और पहाड़ियां नंगी हो रही हैं। उनके गहरे सोच ने काम किया और उन्होंने संदेश दिया कि वर्षा के दिनों में हम सब पिकनिक मनाने के बहाने पेड़ लगाएं। इसे नाम दिया गया ‘वन महोत्सव’। मुझे याद है कि हम नौवीं कक्षा में पढ़ते थे और हमारे स्कूल में पहला वन महोत्सव मनाया गया था। तब मैंने भी स्कूल में एक बरगद का पेड़ लगाया था, जो अब साठ सालों के बाद इतना बड़ा हो गया है कि इसके नीचे दो सौ लोग बैठ सकते हैं। उसके बाद मुझे पेड़ लगा कर उन्हें पालने की आदत पड़ गई। पहले कोई भी पेड़ लगा देता था। लेकिन फिर पीपल के गुण का पता चला तो पीपल लगाने लगा। जितने लगाए, उनमें से अब तीन हजार के करीब जिंदा हैं।
खैर, मुंशीजी के रहते पेड़ लगाने का काम ठीक से चला। लेकिन उसके बाद यह औपचारिकता में तब्दील होता गया। लालबहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया। लेकिन यह नारा देश के पेड़ों को हड़प गया। गांव के जो अपने गोचरान थे, वे साफ हो गए। वहां ट्रैक्टर रेंगने लगे। मैदानों की देखा-देखी पहाड़ी लोगों ने भी पहाड़ियों से पेड़ साफ करके सीढ़ीनुमा खेत बना लिए और आलू-मटर की खेती करने लगे। दरअसल, हमने प्रकृति पर कुल्हाड़ी चला दी और उससे दुश्मनी कर ली। अब किसानों के खेतों में छाया के लिए भी दूर-दूर तक कोई


पेड़ नहीं रहे। हमारे कुएं और जोहड़ भी खत्म हो गए तो फिर उनके साथ लगे पेड़ कैसे रहते। नगरों के कंपनीबाग साफ हो गए और वहां कई-कई मंजिलों वाले कंक्रीट के जंगल खड़े हो गए या वहां पार्किंग स्थल बना दिया गया। वन विभाग के लोगों का काम पेड़ों की रक्षा करना है। लेकिन अब बाड़ ही खेत को खा रही है। वही लोग वन माफिया की मिलीभगत से पेड़ों को कटवा कर धनी बनने की होड़ में शामिल हो चुके हैं। पेड़ों की वकालत करने वाला कोई भूला-भटका दिखता भी है तो पूंजीपतियों के समर्थकों द्वारा उसे विकास विरोधी और समाज विरोधी के तौर पर पेश किया जाता है।
देश की आजादी की पचासवीं वर्षगांठ, यानी स्वर्ण जयंती के मौके पर एक सार्वजनिक सड़क पर पचास पीपल के पेड़ मैंने लगाए, उसे पाला-पोसा। लेकिन वहां के जिलाधिकारी ने इन पेड़ों को उखाड़ फेंका। वजह चाहे जो रही। सुप्रीम कोर्ट तक गया। लेकिन कुछ नहीं हुआ। कोई कैसे हिम्मत करे?
आज पूरी दुनिया का ध्यान ‘क्लाइमेट चेंज’ पर है। इस मुद्दे पर विश्व सम्मेलन हो रहे हैं। कानकुन सम्मेलन में जाते समय अपने प्रधानमंत्री को मैंने सुझाव नोट दिया था कि ज्यादा से ज्यादा पीपल लगाएं। पीपल का पंद्रह साल का पेड़ प्रति घंटा और दिन-रात करीब पौने दो किलोग्राम शुद्ध आॅक्सीजन देता है और दो से तीन किलोग्राम कार्बन डाइआॅक्साइड गैस को सोखता है। यही गैस कल-कारखानों, बिजली बनाने वाले कोयले के धुएं आदि से निकल कर वायुमंडल में जाकर ओजोन परत को हानि पहुंचाती है। अगर ऐसे कारखानों के पास बड़ी तादाद में पीपल के पेड़ लगा दिए जाएं तो एक बड़ी समस्या पर काबू पाया जा सकता है और इससे वायुमंडल भी शुद्ध रहेगा।
मेरी राय तो यह है कि ग्राम पंचायत से लेकर लोकसभा का चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति के लिए कम से कम पांच पीपल के पेड़ लगाने की शर्त लगा दी जाए। इसके बाद भी हर वर्ष वह एक पीपल का पेड़ लगाए। इसी तरह, सरकारी खजाने से वेतन या भत्ता लेने वाले और हर विद्यार्थी को अगली कक्षा में जाने के लिए यह शर्त लगा दी जानी चाहिए। अगर सिर्फ दस साल इस पर ईमानदारी से अमल हो तो देखिए कि प्रकृति कैसे हमारी रक्षा में ढाल बन कर खड़ी हो जाती है!

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