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आजादी का फर्ज PDF Print E-mail
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Thursday, 28 February 2013 09:34

भरत तिवारी
जनसत्ता 28 फरवरी, 2013: हमारे बुद्धिजीवी पड़ोसी दुबे जी का कॉलोनी में अपनी समझदारी के चलते काफी दबदबा है। दरअसल, कॉलोनी से लेकर दोनों ध्रुवों तक होने वाली घटनाओं से उनका सरोकार रहता है और समय-समय पर वे हम सभी को तथ्यों के साथ किसी बात के सही होने या नहीं होने के बारे में बताते रहते हैं। वे किसी भी गलत बात पर बेहिचक, बिना डरे अपना पक्ष रखते हैं। यही वजह है कि मैं उनका कायल भी हूं। जिस सुबह अफजल को फांसी दी गई थी, उस दिन कुछ देर तक टीवी देखने के बाद मैं टहलने निकल गया। पार्क में मित्रों को सुबह की सैर करते नहीं देख मैं चौंका। आगे बढ़ा तो देखा कि सारे मित्र बरगद के पेड़ के नीचे जमा हैं। बीच में दुबे जी हैं। उनकी दमदार आवाज सुनाई पड़ी- ‘बहुत अच्छा काम हुआ, जैसे भी हुआ। देर से ही सही, लेकिन सरकार ने कुछ तो किया!’ मुझे यह नहीं समझ आया कि आज दुबे जी भला सरकार की तरफ कैसे! उन्होंने आगे कहा- ‘बाकियों को भी रस्सी से लटका दें तो फिर मानूंगा कि ये चुनावी पैंतरा नहीं है! यहां तो यह हाल हो गया था कि सबकी याचना बिना लाइन लगवाए, बिना पूछे सुनी जा रही थी। धड़ाधड़ माफी की पर्चियां कट रहीं थीं।’
मुझे हंसी आ गई। दुबे जी बड़ी बातों को भी कितनी आसानी से कह जाते हैं। ‘दामिनी’ के साथ हुए अपराध के मामले में भी उनका कहना यही था कि कठोर सजा मिले बगैर कुछ नहीं होना है। कई बार तो उनके हल सुन कर लगता था कि ये तानाशाही बातें हैं। लेकिन यह भी लगा कि ऐसे दरिंदों को दुनिया में रहने का कोई हक नहीं है। जाने कब किसके साथ क्या कर डालें! खैर, मुझे देख कर उन्होंने कहा- ‘लीजिए, गांधीजी आ गए। माफ करें बापू...! अब तो अफजल फांसी पर चढ़ गया!’ दुबे जी ने बरगद की पत्ती हवा में झुलाते हुए कहा- ‘आपके प्रजातंत्र में अभी जान बाकी है।’ हम सब पहले ही खुश थे। अब फैसले पर दुबे जी की मुहर भी लग गई थी। पार्क के दो चक्कर लगा कर मैं और दुबे जी घर की ओर चल पड़े। रास्ते भर ‘नेक फैसले’ पर बातें होती रही। दफ्तर में मैंने सुबह के अपने अर्जित ज्ञान का अच्छा प्रदर्शन किया। एक सुबह यह ज्ञान मैंने अपनी पत्नी को भी देने की कोशिश की। उनका


जवाब फौरन आया- ‘दुबे जी से पूछिए कि ‘दामिनी’ के हत्यारों को भी सूली पर लटकाया जाएगा या नहीं?’
बीती रात दुबे जी पत्नी के साथ हमारे घर खाने पर आमंत्रित थे। महिलाएं दूसरे कमरे में बतिया रही थीं और हम दोनों अपने गिलास को दोबारा भर कर टीवी पर खबरों की खाल उधेड़ रहे थे- ‘चलिए, कम से कम अब न्याय प्रक्रिया रास्ते पर आ गई है।’ मैंने दुबे जी के दिए गए ज्ञान को उन्हें देते हुआ कहा- ‘अफजल की फांसी अच्छा कदम है। बस अब दामिनी...!’ दुबे जी ने ऐसा मुंह बनाया मानो गिलास में नींबू-पानी हो और बीज दांतों के नीचे आ गया हो। उन्होंने कहा- ‘आपको क्या लगता है भाई साब! फांसी कोई मजाक है!’ दुबे जी गुस्से में बोले- ‘अपराधी है तो क्या हुआ, इंसान पहले है। ऐसे तो आप सबको ही फांसी चढ़वा देंगे।’ वे बोलते गए- ‘फांसी मानवता के विरुद्ध है। उस बेचारे को मुंह अंधेरे चुपचाप, बगैर किसी को बताए फांसी चढ़ा दिया। ऐसे नहीं होता। कोई तानाशाही है क्या! हम चुप नहीं रहेंगे। यह हत्या है। चुनाव आ रहे हैं तो क्या सबको मार कर वोट लिया जाएगा। आखिर रहम की अर्जी का भी कुछ तो मोल होगा!’
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मेरे समझने में कमी है या फिर हाथ में पकड़े खाली हो चुके गिलास का असर है। फिर रात देर तक नींद नहीं आई। बस यही सवाल जेहन में घूमता रहा कि आखिर दुबे जी उस दिन सही थे, जब वे बरगद के नीचे फांसी दिए जाने की खुशी में ‘जय हिंद’ का नारा लगा रहे थे, या फिर आज, जब वे पूरी संसद को खत्म करने के इरादे रखने वालों के साथी की फांसी को हत्या कह रहे थे। तब सही थे जब याचना की अर्जी सुने जाने को ठीक कह रहे थे या फिर अब...!
सुबह दफ्तर में भी कुछ ऐसा ही माहौल देख मैं चुप रहा। जो दुबे जी भ्रम दूर करते थे, उन्होंने ही भ्रमित कर दिया था। रात में बड़े दिनों बाद अपनी डायरी निकाली और उसमें लिखा- ‘बोलने की आजादी मिलना बहुत बड़ी आजादी है। लेकिन यह भी जरूरी है कि जिस तरह देश की आजादी की रक्षा करना हम अपना फर्ज समझते हैं, उसी तरह बोलने की आजादी को बर्बाद नहीं करना भी हमारा फर्ज है!’

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